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Covishield ही नहीं, Covaxin भी बनी खतरा, हो रहीं ये गंभीर बीमारियां

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Covishield ही नहीं, Covaxin भी बनी खतरा, हो रहीं ये गंभीर बीमारियां

हाल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, Covaxin लेने वाले हर तीन में से एक व्यक्ति को साइड इफेक्ट का सामना करना पड़ा है। इन लोगों में सांस से जुड़ी समस्याएं, त्वचा की समस्याएं और हड्डियों एवं जोड़ों से जुड़ी समस्याएं देखी गई हैं।

नई दिल्ली: एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि कोरोना से बचाव के लिए ली गई वैक्सीन कोवैक्सीन लेने वालों में से एक तिहाई लोगों को साइड इफेक्ट का सामना करना पड़ा है। अध्ययन के मुताबिक, कोवैक्सिन लेने वाले हर तीन में से एक व्यक्ति को वैक्सीन लेने के एक साल के भीतर हल्की समस्याएं हुईं। ये समस्याएं आमतौर पर दवाओं के कुछ विशेष साइड इफेक्ट्स माने गए हैं। यह अध्ययन स्पिंगलर इंटरनैशनल द्वारा प्रकाशित अकादमिक जर्नल ‘ड्रग सेफ्टी’ में प्रकाशित हुआ है।

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रिपोर्ट किए गए साइड इफेक्ट्स में मुख्य रूप से ऊपरी श्वसन पथ का संक्रमण, त्वचा संबंधी समस्याएं और मस्कुलोस्केलेटल समस्याएं शामिल हैं, जो हड्डियों और जोड़ों से जुड़ी होती हैं। अध्ययन का दावा है कि हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक द्वारा विकसित कोविड-19 वैक्सीन कोवैक्सिन लेने वाली 5 प्रतिशत महिलाओं में मासिक धर्म से जुड़ी असामान्यताएं देखी गईं।

यह अध्ययन उस समय सामने आया है, जब दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका ने स्वीकार किया है कि उसकी कोविड वैक्सीन से बहुत ही कम मामलों में खून के थक्के जमने की समस्या हो सकती है। भारत में एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का उत्पादन कोविशील्ड नाम से हुआ था, जिसे सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने बनाया है। कोवैक्सिन भारत में कोविशील्ड के बाद सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला कोविड वैक्सीन था।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के 926 कोवैक्सिन लेने वालों से संपर्क किया और उनसे वैक्सीन लेने के एक साल बाद होने वाली किसी भी तरह की समस्याओं के बारे में पूछा। अध्ययन के अनुसार, 48% किशोरों (304) और 43% वयस्कों (124) में साल भर में वायरल संक्रमण (जुकाम आदि) की समस्या हुई।

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भारत बायोटेक कंपनी का कहना है कि सुरक्षा से जुड़े ऐसे अध्ययनों को सही जानकारी देने और किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से बचने के लिए कई तरह के आंकड़ों को ध्यान में रखना जरूरी होता है।

अनुसंधानकर्ता ने कही ये बातें

फ्लिंडर्स के प्रोफेसर टॉम गॉर्डन ने कहा कि इन विकारों में घातक एंटीबॉडी बनने की प्रक्रिया वास्तव में समान होती है। उन्होंने बताया कि हमारा समाधान वीआईटीटी संक्रमण के बाद खून के थक्के जमने के दुर्लभ मामलों पर लागू होता है और यह वैक्सीन के विकास पर भी कार्य करता है। इसी टीम ने 2022 में एक रिसर्च में पीएफ4 एंटीबॉडी की आणविक संरचना की खोज की थी। इसके अलावा, एक आनुवंशिक जोखिम की भी पहचान की गई थी।

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित नए निष्कर्ष, वैक्सीन सुरक्षा में बदलाव के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ सुझाते हैं। यह रिसर्च एस्ट्राजेनेका द्वारा फरवरी माह में उच्च न्यायालय में प्रस्तुत एक कानूनी दस्तावेज में मंजूर किए जाने के बाद आया है कि इसका कोविड वैक्सीन बहुत ही दुर्लभ मामलों में थ्रोम्बोटिक थ्रोम्बोसाइटोपेनिक सिंड्रोम (TTS) का कारण बन सकता है। टीटीएस एक रेयर साइड इफेक्ट है जिसकी वजह से लोगों में ब्लड क्लॉटिंग हो सकती है। इसके अलावा, खून में प्लेटलेट की मात्रा भी घट सकती है। इसे ब्रिटेन में कम से कम 81 मौतों से जोड़ा गया है। कंपनी ने तत्परता से यूरोप और दूसरे वैश्विक बाजारों से अपने कोविड वैक्सीन के “विपणन प्राधिकरण” को भी वापस ले लिया है।

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